उत्तर प्रदेश में महिला सम्पादक को CAA के संवैधानिक तरीके से विरोध की अनुमति मांगना पड़ा महंगा।


कहेंगी फ़ख़्र से सदियों तक नस्लें,
हमने भी नक़ाब मे इन्क़लाब देखा है...
शायद ये पंक्तियां आज हिन्दुस्तान के कोने कोने से होने वाले CAA और NRC, NPR के विरोध में महिलाओं के इस जज़्बे को देखकर सटीक बैठती नज़र आती हैं


वैसे तो कहने को ये देश महिला प्रार्थमिक माना जाता है, और महिला सशक्तिकरण के दावे किए जाते हैं, महिला सुरक्षा कानून बनाने के वादे सरकारें करती आ रही हैं, पर प्रश्न उठता है क्या वाक़ई में ये सरकार महिलाओं को अबला समझती है?


तो आज के मौजूदा हालात जवाब देते हैं बिल्कुल नहीं। क्योंकि पिछले दिनों जो देश के संविधान की लड़ाई लड़ने झांसी की रानियां मैदान में उतरी उनको सम्मान नहीं बल्कि बिकाऊ के तमगे से नवाज़ा गया, तो कहीं महिलाओं के लबादे खींच कर ले जाती पुलिस ने फिर एक बार चीर हरण की घटना को दोहरा दिया। कहीं सत्ता की कठपुतली बनी पुलिस ने लाठियों से नवाज़ कर महिलाओं को सशक्त बनाया तो कहीं आंसू गैस और गोलियां बरसाकर महिला सुरक्षा के नारे को बल दिया।


क्या सचमुच देश मे महिलाओं को संविधान की रक्षा हेतु संवैधानिक तरीके से मांग करना इतना बड़ा गुनाह है। आख़िर अभिव्यक्ति की आज़ादी की आवाज़ बुलंद करने वाले तथाकथित लोग इन आज़ादी के नारों से बौखलाए हुए क्यों नज़र आ रहे हैं।


इस पर उत्तर प्रदेश पुलिस की बानगी देखिए जहां एक महिला सम्पादक को सिर्फ इसलिए मुक़दमे में फंसा दिया गया क्योंकि उन्होंने संवैधानिक तरीके से अपना विरोध दर्ज कराने की मात्र अनुमति प्रशासन से मांगी थी। जी हाँ उत्तर प्रदेश के एक दैनिक अख़बार की सम्पादक महोदया बिजनौर निवासी नाहिद फातिमा को संवैधानिक रूप से अनुमति मांगने का सिला सरफिरी पुलिस ने उल्टा शांति भंग की आशंका में मुकदमा दर्ज़ करके दिया। और तो और अनुमति मांगने पर पुलिस ने मुक़दमा तो किया ही साथ ही बरगलाई पुलिस ने एक विवाह समारोह के लिए लगे शामियाने को धरना स्थल समझते हुए तहस नहस कर घृणित कारनामें को अंज़ाम दे दिया।


जहां बीते दिनों CAA के शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारी युवकों की गोली लगने से हुई शहादत से पुलिस की कार्यशैली पर सवालिया निशान लगा था वहीं महिला सम्पादक नाहिद फ़ातिमा पर मुक़दमे से इस घटना ने पुलिस को जनता की अदालत के कटघरे में खड़ा कर दिया है।


क्या वाक़ई लगता है कि देश में अभिव्यक्ति, संविधान नियम, कानून नाम की कोई चीज़ बची है यदि बची है तो फिर ये उत्पीड़न कैसा? फिर ये आवाज़ को दबाने का हिटलरशाही रवैया कैसा? मुझे लगता अब वक्त आ गया है देश की हर नाहिद फ़ातिमा के साथ कदम मिलाकर चलने का क्योंकि देश के संविधान को बचाने का ज़िम्मा सिर्फ हमारी माताओ बहनों का नहीं बल्कि हम सबका भी अधिकार है।